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जागो चम्पु जागो

Posted by Nirbhay Jain Sunday, August 30, 2009, under | 0 comments
परेशान थी चम्पु की वाइफ
Non-happening थी जो उसकी लाइफ
चम्पु को ना मिलता था आराम
ओफिस मैं करता काम ही काम

चम्पु के बॉस भी थे बड़े कूल
परमोशन को हर बार जाते थे भूल
पर भूलते नही थे वो डेडलाइन
काम तो करवाते थे रोज़ till nine

चम्पु भी बनना चाहता था बेस्ट
इसलिए तो वो नही करता था रेस्ट
दिन रात करता वो बॉस की गुलामी
Onsite के उम्मीद मैं देता सलामी

दिन गुज़रे और गुज़रे फिर साल
बुरा होता गया चम्पु का हाल
चम्पु को अब कुछ याद ना रहता था
ग़लती से बीवी को बहेनजी कहता था

आख़िर एक दिन चम्पु को समझ आया
और छोड़ दी उसने Onsite की मोह माया
"तुम क्यों सताते हो ?
"Onsite के लड्डू से बुद्दु बनाते हो"

"परमोशन दो वरना चला जाऊंगा"
"Onsite देने पर भी वापिस ना आऊंगा."
बॉस हंस के बोला "नही कोई बात"
"अभी और भी चम्पु है मेरे पास"

"यह दुनिया चमपुओं से भरी पड़ी है"
"सबको बस आगे बढ़ने की पड़ी है"
"तुम ना करोगे तो किसी और से करवाऊंगा"
"तुम्हारी तरह एक और चम्पु बनाऊंगा"

ये कैसी महोब्बत

Posted by Nirbhay Jain Tuesday, August 25, 2009, under | 3 comments


ये कैसी महोबत कहां के फसाने
ये पीने पीलाने के सब है बहाने

वो दामन हो उनका सुमसाम सेहरा
बस हम को तो अब है आंसु बहाने

ये किसने मुझे मस्त नजरों से देखा
लगे खुद-बखुद ही कदम लडखडाने

चलो तुम भी गुमनाम अब मयकदे मे
तुम्हे दफ्न करने है कइ गम पुराने

ये कैसी महोबत कहां के फसाने ....

भारत हमको जान से प्यारा है

Posted by Nirbhay Jain Saturday, August 8, 2009, under | 0 comments

भारत हमको जान से प्यारा है
सबसे न्यारा गुलिस्तां हमारा है
सदियों से भारत भूमि दुनिया की शान है
भारत मां की रक्षा में जीवन क़ुर्बान है
भारत हमको जा से ...

उजड़े नहीं अपना चमन, टूटे नहीं अपना वतन
दुनिया धर धरती कोरी, बरबाद ना करदे कोई
मन्दिर यहाँ, मस्जिद वहाँ, हिन्दू यहाँ मुस्लिम वहाँ
मिलते रहे हम प्यार से
जागो ...

हिन्दुस्तानी नाम हमारा है, सबसे प्यारा देश हमारा है
जन्मभूमि है हमारी शान से कहेंगे हम
सभी तो भाई-भाई प्यार से रहेंगे हम
हिन्दुस्तानी नाम हमारा है

आसाम से गुजरात तक, बंगाल से महाराष्ट्र तक
झनकी सही गुन एक है, भाषा अलग सुर एक है
कश्मीर से मद्रास तक, कह दो सभी हम एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं
जागो ...

- पी के मिश्रा द्वारा लिखित
स्वतंत्रता दिवस प प्रसारित



दोस्ती की बेजोड़ मिसाल हो तुम

Posted by Nirbhay Jain Sunday, August 2, 2009, under | 1 comments
दोस्ती की बेजोड़ मिसाल हो तुम
न है कोई कमी लाज़बाब हो तुम
नही कोई ऐसा मेरे "दोस्त" जैसा
दोस्तों की एक अलग पहचान हो तुम
तुम से बात हो मुझे सुकून मिलता है
जाते हो कंही तो बेजान कर जाते हो तुम.
नही करता मन तुमसे दूर होने का एक पल
मजबूरियों से घिरी बहुत परेशान हो तुम
प्यार तो देखा है ज़माने का मैंने.
दोस्ती मैं मुहब्बत की एक अलग पहचान हो तुम
तुम्हारी दोस्ती ने ही एक बेजान को जानदार बनाया
गिरते हुए दोस्त को संभालना सिखाया.
नही चुका पाउँगा कभी दोस्ती का क़र्ज़
कितने प्यार से निभाया तुमने दोस्ती का फ़र्ज़.
गिरते हुए हालत मे मेरे मददगार हो तुम
दोस्ती क्या होती है इस बात से भी खबरदार हो तुम.

कहते हैं तारे गाते हैं!

Posted by Nirbhay Jain Saturday, August 1, 2009, under | 4 comments
कहते हैं तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का
यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!
स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथिवी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों से
तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!
ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता,
आँसू नीचे झर जाते हैं!
कहते हैं, तारे गाते हैं!
-हरिवंश राय बच्‍चन

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

Posted by Nirbhay Jain Friday, July 31, 2009, under | 8 comments

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना अखरता है.
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
जब तक सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
-हरिवंश राय बच्चन

फिर नज़र से ............

Posted by Nirbhay Jain Wednesday, July 22, 2009, under | 4 comments

फिर नज़र से पिला दिजीये!
होश मेरे उडा दिजीये...

छोडीये दुश्मनी की रज़िश
अब जरा मुस्कुरा दिजीये..

बात अफसाना बन जायेगी
इस कदर मत हवा दिजीये..

आइए खुल के मिलीए गले
सब तखल्लुक हटा दिजीये..

कब से मुस्ताके दिदार हूं
अब तो जलवा दिखा दिजीये॥

-जगजीत सिंह की 'आयना' से

वीरेन्द्र जैन की व्यंग्य कविता

Posted by Nirbhay Jain Saturday, March 21, 2009, under | 0 comments

जय हो!

http://kakarun2000.blog.co.in/files/2009/02/jai-ho1.jpg

जय हो, जय हो, जय हो, जय हो, जय हो जय हो

लूट मार के बाद सभी का अपना हिस्‍सा तय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

दल बदलू वोटों की जय हो

संसद में नोटों की जय हो

लोकतंत्र की इस चौपड़ में

अमरीकी गोटों की जय हो

सीनाजोरी करता फिरता हर दलाल निर्भय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

सच पर प्रतिबंधों की जय हो

जाँचों के अन्‍धों की जय हो

लोकतंत्र के नाम चल रहे

सब काले धंधों की जय हो

मतलब तो सीधा सपाट पर पेंचदार आशय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

पंजों की कमलों की जय हो

कांटों के गमलों की जय हो

कन्‍याओं पर राम नाम की

सेना के हमलों की जय हो

गूंगी जनता बहरा शासन अंधा न्‍यायालय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

हुल्लड मुरादाबादी की रचना

Posted by Nirbhay Jain , under | 0 comments
ज़िन्दगी़ में मिल गया कुरसियों का प्यार है
अब तो पांच साल तक बहार ही बहार है
कब्र में है पांव पर
फिर भी पहलवान हूँ
अभी तो मैं जवान हूँ


सोयी है तक़दीर ही जब पीकर के भांग
मंहगाई की मार से टूट गयी है टांग
तुझे फोन अब नहीं करूंगा
पी सी ओ से हांगकांग
मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग


तू पहले ही है पिटा हुआ ऊपर से दिल नाशाद न कर
जो गयी जमानत जाने दे वह जेल के दिन अब याद न कर
तू रात फोन पर डेढ़ बजे विस्की रम की फरियाद न कर
तेरी लुटिया तो डूब चुकी ऐ इश्क मुझे बरबाद न कर


इक चपरासी को साहब ने कुछ ख़ास तरह से फटकारा
औकात न भूलो तुम अपनी यह कह कर चांटा दे मारा
वह बोला कस्टम वालों की जब रेड पड़ेगी तेरे घर
सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा

राहत इंदौरी की रचना

Posted by Nirbhay Jain , under | 0 comments
दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राए ली जाए

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में
अब कहां जा के सांस ली जाए

बस इसी सोच में हूं डूबा हुआ
ये नदी कैसे पार की जाए

मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे
आज फिर कोई भूल की जाए

बोतलें खोल के तो पी बरसों
आज दिल खोल के भी पी जाए

......................................................

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं

रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं

मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहां
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं

आंसुओं और शराबों में गुज़र है अब तो
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं

जाने कुआ टूटा है पैमाना दिल है मेरा
बिखरे बिखरे हैं ख़यालात मुझे होश नहीं

.......................................................

चेहरों की धूप आंखों की गहराई ले गया
आईना सारे शहर की बीनाई ले गया

डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सरा करें
ये हादसा तो सोच की गहराई ले गया

हालांकि बेज़ुबान था लेकिन अजीब था
जो शख़्स मुझसे छीन के गोयाई ले गया

इस वक़्त तो मैं घर से निकलने ना पाऊंगा
बस इक कमीज़ थी जो मेरा भाई ले गया

झूठे क़सीदे लिखे गए उस की शान में
जो मोतियों से छीन के सच्चाई ले गया

यादों की एक भीड़ में साथ छोड़ कर
क्या जाने वो कहां मेरी तन्हाई ले गया

अब असद तुम्हारे लिए कुछ नहीं रहा
गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

अब तो खुद अपनी सांसे भी लगती हैं बोझ सी
उम्रों का देव सारी तन्हाई ले गया

डॉ कुमार विश्वास की रचना

Posted by Nirbhay Jain , under | 0 comments
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है,
मैं तुझसे दूर कैसा हुँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है !!!


समुँदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आसुँ प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता ,
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता !!!


मुहब्बत एक एहसानों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है,
यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूँ हैं
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है !!!



भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हँगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पला बैठा तो हँगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे हम किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हँगामा !!!