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आँखे

Posted by Nirbhay Jain Tuesday, September 1, 2009, under | 2 comments

जब तीर चला नज़र का
भेद गया मेरे दिल को
जब पलके उठाई उसने
हाय! में कैसे संभालू दिल को
उसकी भोली सी खूबसूरत आँखे
जैसे समझाती है मुझको
झील सी गहरायी है इनमे
तभी तो डूबा लेती है मुझको
उसकी आँखों की चमक ये कहती है
छुपा लू दामन में तुझको
क्यों डूबता जा रहा हूँ मै
यह ख़बर नही है मुझको
जब देखे आँखों में अश्क उसके
क्यों संभाल नही पाया में ख़ुद को
खुदा से फरियाद करने लगा मै
दें दें उस नाजनीन के ग़म मुझको
ऐ ममता अब तू ही बता
क्या मिलेंगे उसके ग़म मुझको

-ममता अग्रवाल

मुझे याद रखना

Posted by Nirbhay Jain Sunday, August 30, 2009, under | 3 comments
मेरी तुमसे बस इतनी सी है इल्तेज़ा
हमेशा मुझे याद रखना
मेरे साथ जो पल बीते है तुम्हारे
कम से कम उन्हें तो यद् रखना
जो भी प्यार करते है आपको
उनमे मेरा नाम याद रखना
अगर मुश्किल हो याद करना
तो बस एक काम करना
बना लेना कोई और हमसाया
फ़िर उसे ही याद रखना
भूले से भी आजाये याद हमारी
तो ये समझना
की बड़ा मुश्किल है मुझे याद रखना

कैसा ये रिश्ता है ?

Posted by Nirbhay Jain Monday, August 17, 2009, under | 0 comments

ख्वाब और हकीकत में
इश्क और नजाकत में
दिल और दिमाग में
कागज़ और किताब में
फूल और खुशबू में
दिल की धुकधुक में
एक अजीब सा रिश्ता है
एक के बिना दूसरा अधूरा है
एक चलता है एक रुकता है
एक बढ़ता है एक झुकता है
क्यों ख्वाब हकीकत बनना चाहता है
क्यों इश्क में नज़ाक़त होती है
क्यों दिल पैर दिमाग हावी है
क्यों कागज़ बिना किताब बेभावी है
क्यों फूल ही खुशबु देता है
महबूब के छूटे ही
क्यों दिल धुकधुक करता है
कैसा ये रिश्ता है ?
बोल ममता बोल
कैसा ये रिश्ता है ?

मौत का खेल .. (६ अगस्त १९४५ नागासाकी)

Posted by Nirbhay Jain Friday, July 24, 2009, under | 0 comments
सहसा हुआ एक धमाका....
सोते से वे सब जगे,
उगता आग का गोला देखा..
पर कुछ पलो के लिए.
अचानक गर्मी बढ़ी.
झुलश गए सब चेहरे..
वे चिल्लाये
पर कुछ पलो के लिए..
"लिटिल बॉय" ने कर दिखाया कमाल,
६ अगस्त कि रात को बना दिया शमसान..
लाखो कि चिता जली,
गल गए हड्डी मांस,
कुछ पलो के बाद हो गया सब समाप्त,
बचा सिर्फ एक निशान...
हैवान सिर्फ हैवान....
पल में लाख कॉल के गाल समाये
पर इन अतातइयो को दया नहीं आई.
९ अगस्त कि रात को किया फिर कमाल...
लाख फिर घबराए,चीखे और चिल्लाये,
पर कुछ पलो के लिए,
फिर वे भी बन गए मौत के ग्रास..
हो गयी चारो तरफ शांति...
क्यूकि,
शोर के लिए चाहिए जान....
जो तब हो चुकी थी समाप्त
जो तब हो चुकी थी समाप्त।!!
- ममता अग्रवाल

दोस्त ... जिसे ढूंढ रही थी ...

Posted by Nirbhay Jain Monday, July 20, 2009, under | 5 comments
इस वीरान अँधेरी दुनिया में
अपनी इन पलकों को झपका कर
एक ऐसे साथी को ढूंढ रही थी
जो दिल की हर बात समझ सके
उससे में अपनी हर बात कह सकू
उस पर इतना विश्वास कर सकू
उसको अपना बना सकू
जिसे में जानती नही पहचानती नही
उस स्वप्न की काल्पनिकता को
पलके झपका कर ढूंढ रही हूँ
जब मै उसकी आँखों की तरफ़ देखू
कुआ सा प्यारा लगे वो
बाँट सकू उससे अपने जीवन का हर पहलु

उस दोस्त को जिससे मै कभी मिली भी नही अभी
हर वायदा पूरा करने को हर दूरी मिटा दू
उस ज़िन्दगी में जो इसके रूप में चेतन हो गई है
हर दूरी से दूर जो एक दोस्त मेरा बैठा है
अब वो यहाँ है
मै भी यहाँ हूँ
इस अजनबी दुनिया का करने को आलिंगन
अब ये दुनिया लगती है मुझे सतरंगी
जिसमे है मेरा वो दोस्त अजनबी
हाँ वो तुम्ही हो तुम्ही हो तुम्ही हो
- ममता अग्रवाल